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मंगलवार, 29 मार्च 2011

फिलिस्तीन के राष्ट्रीय कवि महमूद दरवेश की रचनाएँ देशप्रेम और उस पर इजरायली कब्जे की पीड़ा से सराबोर हैं. उनकी कविता देश-निकाला झेलते आदमी की तकलीफ ही नहीं बल्कि उसके प्रतिरोध को भी व्यक्त करती है.पेश है उनकी एक महत्वपूर्ण कविता का अनुवाद...
          मैं वहाँ से आया हूँ 
          मैं वहाँ से आया हूँ और मेरे पास स्मृतियाँ हैं,
          मैं औरों की तरह नश्वर हूँ और मेरे पास माँ है,
          और है एक घर अनेक खिडकियोंवाला,
          मेरे पास भाई, बंधु हैं
          और एक कारागार भी है, जिसकी
          खिड़कियाँ सर्द हैं.
          वह लहर भी मेरी है जिसे अभी-अभी
          समुद्री चिड़िया ने निगल लिया है,
          मेरे पास मेरे विचार हैं,
          और एक अतिरिक्त घास की पत्ती भी.
          शब्दों के दूर तक फैले किनारे पर बैठा,
          वह चन्द्रमा भी मेरा है,
          और चिड़ियों की अनकही उदारता,
          और जैतून वृक्ष की अकल्पनीय अनश्वरता भी.
          जिस भूमि, पर मैंने तलवारों के साये में गति पाई है
          उसका जीवंत शरीर अब निष्क्रिय बोझा भर है.
          मैं, मैं वहाँ से आया हूँ.
          मैंने खुले आकाश को उसकी माँ को सौंप दिया है,
          जब वह माँ के लिए विलाप कर रहा था.
          और मैं भी रोया,
          लौटते बेसब्र बादल को अपनी पहचान बताने के लिए.
          मैंने रक्त के आँगन में लिथड़े सारे शब्द सीख लिए हैं,
          ताकि भंग कर सकूँ नियमों को.
          मैंने सारे शब्दों को कंठस्थ कर उन्हें
          खंडित कर दिया है ताकि
          नवीन शब्द-सृजन कर सकूँ: मातृभूमि... .
 

13 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी पोस्ट, शुभकामना, मैं सभी धर्मो को सम्मान देता हूँ, जिस तरह मुसलमान अपने धर्म के प्रति समर्पित है, उसी तरह हिन्दू भी समर्पित है. यदि समाज में प्रेम,आपसी सौहार्द और समरसता लानी है तो सभी के भावनाओ का सम्मान करना होगा.
    यहाँ भी आये. और अपने विचार अवश्य व्यक्त करें ताकि धार्मिक विवादों पर अंकुश लगाया जा सके., हो सके तो फालोवर बनकर हमारा हौसला भी बढ़ाएं.
    मुस्लिम ब्लोगर यह बताएं क्या यह पोस्ट हिन्दुओ के भावनाओ पर कुठाराघात नहीं करती.

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  2. लौटते बेसब्र बादल को अपनी पहचान बताने के लिए.
    मैंने रक्त के आँगन में लिथड़े सारे शब्द सीख लिए हैं,
    ताकि भंग कर सकूँ नियमों को.
    मैंने सारे शब्दों को कंठस्थ कर उन्हें
    खंडित कर दिया है ताकि
    नवीन शब्द-सृजन कर सकूँ: मातृभूमि... .


    बहुत ही अच्छी कविता है।
    आपके ब्लॉग पर आकर अच्छा लगा।

    सादर

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  3. A suggestion-

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    Regards.

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  4. संदेशपरक रचना की प्रस्तुति है।

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  5. लौटते बेसब्र बादल को अपनी पहचान बताने के लिए.
    मैंने रक्त के आँगन में लिथड़े सारे शब्द सीख लिए हैं,
    ताकि भंग कर सकूँ नियमों को.
    मैंने सारे शब्दों को कंठस्थ कर उन्हें
    खंडित कर दिया है ताकि
    नवीन शब्द-सृजन कर सकूँ: मातृभूमि... .बहुत ही बहुत सुन्दर कविता है।
    आपके ब्लॉग पर आकर बहुत अच्छा लगा। धन्यवाद...

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  6. Thanks Yashwantji, Vijaiji. Yashwantji aapke sujhaw ke anusar maine badlaw kar diye hain.

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  7. कल 24/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  8. इस सुदंर रचना की प्रस्तुति के लिए आभार.

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  9. नियम टूटते हैं तो सुन्दर सृजन होता है.

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  10. बहुत ही खुबसूरत प्रस्तुति ...

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