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बुधवार, 7 सितंबर 2011

बम विस्फोट और निरीह जनता

दिल्ली उच्च न्यायालय के पास विगत साढ़े तीन महीने के अन्तराल में दो बम धमाकों ने न केवल देश में बल्कि पूरे विश्व पटल पर भारतीय सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल दी हैं. इस विस्फोट में लगभग ११ लोगों की मृत्यु हुई है और ६५ लोग घायल हैं. इस घटना ने पुलिस और ख़ुफ़िया विभाग के बीच के गहरे असामंजस्य को उजागर किया ही है तथा साथ ही सुरक्षा, सुरक्षा-एजेंसियों और आतंकवाद की समस्या पर अत्यधिक राजनितिक गैर पेशेवराना दबाव के सच को भी रेखांकित किया है. 
यह उच्च न्यायालय जैसे संवेदनशील स्थान में सुरक्षा की भारी कमी की के सच को भी पुख्ता करता है. एक बार धमाका हो जाने के बाद भी पर्याप्त सुरक्षाबलों और सी सी टी वी कैमरे का अभाव पुलिस, प्रशासन की व्यावहारिक और तकनीकि असफलता है.लगभग  साढ़े तीन महीने में यह तय नही हो पाया कि कैमरे कौन लगाएगा? २००९ तक विशेष आतंकवाद विरोधी केंद्र बन जाने की बात थी जो अबतक पूरी नही हो पाई है. इस समय पुलिस व सुरक्षा संगठनो में तालमेल का अभाव, सूचनाओं की निश्चित अवधि में आदान-प्रदान की कमी भी है. पुलिस भी राजनीतिक आकाओं की सेवा, सुरक्षा में लगी रहती है. उसमे पेशेवर रवैये की कमी है. वह जनता के प्रति अपने दायित्व निभाने में असक्षम है.पुलिस के सबसे नीचे का सुरक्षा घेरा अत्यधिक कमजोर है. ये सारी बातें सच होने के बावजूद इकहरी हैं. सचाई यह भी है कि पुलिस के पास संसाधनों और मैन पावर की व्यापक कमी है, दायित्व ज्यादा हैं. पूरे देश में पुलिस से सम्बंधित पदों में भर्ती नही हो पाई है. नये राज्यों के निर्माण के साथ सुरक्षा की जरूरतें तो बढ़ीं किन्तु उस अनुपात में प्रशिक्षण केन्द्रों की स्थापना नहीं हो पाई. यह भी तथ्य छुपा हुआ नही है कि आतंकी संसाधनों के मामले में कहीं ज्यादा समर्थ व खतरनाक हैं. देश की सबसे बड़ी गुप्तचर एजेंसी आई बी में ९४४३ पद रिक्त पड़े हैं. लोकसेवा के उच्चतम पदों का भी यही हाल हैं. भर्ती की प्रक्रियाओं की पेचीदा स्थिति ने व्यक्तिगत लाभलोभ, भ्रष्टाचार और राजनीतिक दखलअंदाजी को बढ़ा दिया हैं. एन एस जी ,एन आई ए जैसे संगठन बने तो हैं किन्तु पर्याप्त नही हैं. राज्य और केंद्र के बीच भी ज्यादा संतुलन की जरुरत है.
फिलवक्त की वास्तविकता यह है कि आतकवाद की जड़ तक पहुँचने में नाकामयाबी,बढ़ते हमले, झूठे आश्वासन ने यह बहस तेज कर दी है कि क्या भारत एक निष्क्रिय (पैसिफिक/सॉफ्ट) राष्ट्र है? कानून होने के साथ उसे निश्चित समयावधि में लागू करना भी जरुरी हैं. ऐसे जनसंहार के विरुद्ध कठोर असहिष्णु रूख ही अपराधियों को  भयभीत कर सकेगा. इसके लिए न्याय प्रक्रिया में तेजी लाने की भी जरुरत हैं. ऐसी घटनाओं से सबक लेकर न केवल आमजन की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की वरन जिम्मेदार लोगों, अफसरों की जवाबदेही तय करने की आवश्यकता है. ताकि उचित सुरक्षा व सूचना तंत्र खड़ा किया जा सके. 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपके द्वारा व्यक्त विचार और सुझाव सार्थक हैं। इस हमले से पूर्व 09 बजे क्वेटा मे भी आतंकी हमला हुआ जिसमे फौजी अधिकारी की पत्नी भी मारी गईं। अमेरिकी साम्राज्यवाद द्वारा पोषित इस अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद का मुक़ाबला शत्रु को केंद्र मे रख कर ही किया जा सकता हैं। परंतु अफसोस कि भारत और पाकिस्तान की सरकारें उसी अमेरिका की शरण मे हैं जो दोनों का साझा शत्रु है।
    वैसे आंतरिक स्तर पर सुरक्षा के मजबूत उपाय करने के साथ-साथ नागरिकों मे भी कर्तव्य बोद्ध जाग्रत करना होगा। चेतावनियाँ जारी की जाती हैं परंतु देख कर भी लावारिस बैग की सूचना किसी ने भी समय पर पुलिस को नहीं दी।

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  2. आपके विचारों से सहमत।
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    कल 09/09/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. सही कहा .विजया जी.सरकार की लापरवाही जनता को भुगतनी पड रही है....सार्थक पोस्ट..

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  4. कोई अपना काम जिम्मेदारी के साथ नहीं करना चाहता है ! देश की सुरक्षा सर्वोपरि है !
    इसकी जड़ में भी भ्रष्टाचार ही है !!


    http://sahitya-varidhi-sudhakar.blogspot.com/

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  5. पता नहीं जनता यह सब कब तक सहती रहेगी ...

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  6. आप सब को विजयदशमी पर्व शुभ एवं मंगलमय हो।

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