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शुक्रवार, 9 दिसंबर 2011

                                            'द डर्टी पिक्चर'

अंततः आज देख पाई 'द डर्टी पिक्चर'. बेहतरीन अभिनेत्री हैं विद्या बालन. फिल्म से अगर कुछ व्यक्तिगत असहमति हैं तो  वह प्रोमोशन में स्त्री के एकल पक्ष को पेश करने से हैं. प्रोमोशन और फिल्म दोनों ही मनोरंजन के टैग लाइन को लेकर चलती हैं. कई बार यह आभास भी होता हैं कि ८० के दशक के दर्शकों और आज के दर्शकों का अंतर समाप्त हो गया हैं. कहीं-न-कहीं यह कहानी पेशेवर नैतिकता को भी तार-तार करती हैं. जहाँ 'सिल्क' का नाम हैं, भरपूर शरीर हैं, कुछ प्रेडिक्टेबल भाव, भंगिमाएं, निश्चित अवसान हैं... असली सिल्क गायब हैं. पुरुष के निर्देशन, वाचन, पुंस प्रधान माध्यम में इससे ज्यादा की अपेक्षा बेमानी हैं, वह भी तब जबकि हिट होने के सारे फंडे जायज़ लगने लगे हैं. ऐसा भी नही कि स्त्री विशेष अच्छी फ़िल्में पुन्सवादी माध्यम और समाज में नही बनतीं किन्तु सफल होने की मानसिकता और बाज़ार की चमक ज्यादा हावी रही हैं.समय के साथ ये दबाव भी बढ़े हैं.


सिल्क के अभिनय में विद्या ने कई बाड़े तोड़े हैं तो कई बना भी दिए हैं. स्त्री क्या केवल शरीर हैं? जिसे देखने, आस्वाद लेने के क्रम में उसका नाम, व्यक्तित्व, उसका मनुष्यत्व ख़त्म कर दिया जाता हैं. उसके जीवन से नैतिक-अनैतिक होने की बहस इस तरह जुड़ गयी हैं कि लाख छटपटाहट के बाद भी वह पित्रिसत्ताक उपाधियों से परे नही जा पाती. आरंभिक ऐश्वर्य, धन उसे भी लुभाता हैं...वह बढ़ती जाती हैं इस खामख्याली में कि अपनी शर्तो पर जी सकती है, आगे बढ़ सकती हैं,'वह ऊपर हैं और सब नीचे'...'सिल्क कोई फिल्म नही जो इंटरवल के बाद बदल जाएँ'... बदलता हैं, सबकुछ बदलता हैं , अपनी ही देह का हथियार के सामान इस्तेमाल करती सिल्क अब इस्तेमाल के लायक नही लगती.'जो था वो तो वह दिखा चुकी'...भंवरी देवी की अकाल मृत्यु , एक न्यूड तस्वीर छपने पर पिता द्वारा घर से बहार निकली गयी वीना मलिक (सौ. नवभारत टाइम्स)...ऐसा मोड़ जब लगता हैं कि शोषक और शोषित का अंतर समाप्त हो चला हैं...


स्त्री के अस्तित्व का अभिन्न हिस्सा उसका शरीर हैं लेकिन वह केवल देह नहीं हैं...केवल देह के धरातल पर वह सजीव मांसपिंड में तब्दील हो जाएगी. इतने तामझाम के बाद कहानी का पूर्वानुमानित ढांचा काफी निराशाजनक हैं. वास्तव में यह आधारहीन कहानी मात्र हैं जहाँ जीवन का अतिसरलीकरण कर दिया गया हैं. नायिका अंततः एक झूठ महसूस होती हैं...कारण कि औरत को उसकी मानसिक, भावनात्मक, शारीरिक, लैंगिक, सामाजिक जटिलता में ही पहचाना जा सकता हैं. मनोरंजन और आनंद प्रदान करने के अतिशय दबाव में स्त्री की फेक इमेज सामने आती हैं. फिल्म-उद्योग का ऐसा काला सच सामने आता हैं कि लगता है कि कोयले की दलाली में सबके हाथ काले हैं. फिर क्यों केवल स्त्री ही ऐसी निर्मम सजा और दुखद अंत की भागीदार बनती हैं? पूरी प्रक्रिया में सिल्क का हारते हुए, थकते हुए निर्णित अंत तक पहुँच जाना कितना सहज तथा स्वाभाविक लगता हैं... ऐसी एकोंमुखी प्रस्तुति अंततः स्त्री को भयभीत करती हैं, उसे जोखिम लेने से डराती हैं... बड़े-बड़े धाँसू डायलाग्स में सिल्क की मायूस जिंदगी महसूस हुए बिना ही बीत जाती हैं... मेरे तईं विद्या की बेहतरीन अदाकारी किन्ही अर्थों में ज़ाया भी हुई हैं...


यहाँ यह प्रश्न भी उठता हैं कि 'जो दिखता हैं, वो बिकता हैं' का तर्क, इंटरटेनमेंट की प्राथमिकता, ने क्या दर्शक वर्ग की रुचियों का परिष्कार और जेंडर सेंसिटाईजेसन  भी किया हैं या नही? दृश्य-श्रव्य माध्यम होने के कारण फिल्मों की विराट पहुँच, विकास व अकूत शक्ति के साथ-साथ जिम्मेदाराना रवैया भी जरूरी हैं.यह फिल्म भी कुछ प्रश्न हमारे सामने अवश्य छोड़ जाती हैं कि स्त्री को कहाँ ढूंढें? वह आखिर कहाँ होती हैं? कब वह होती हैं और कब अनजाने ही फिसल जाती हैं?  वह देह में है या भंगिमाओं में, ह्रदय में हैं या मस्तिष्क में, गर्भ में हैं या योनी में, इच्छाओं में हैं या महत्वाकांक्षाओं में, या शुद्ध अनुभूतियों में हैं... 

3 टिप्‍पणियां:

  1. वह देह में है या भंगिमाओं में, ह्रदय में हैं या मस्तिष्क में, गर्भ में हैं या योनी में, इच्छाओं में हैं या महत्वाकांक्षाओं में, या शुद्ध अनुभूतियों में हैं... जिस बिंदास अंदाज़ में आपने चुभते हुए अनेक सवालों को उठाया है ,वे गंभीर विमर्श की मांग करते हैं .बधाई .

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  2. सबसे ज्यादा लिखावट और उसमे छिपे भाव का समर्थन तहे दिल से करता हु .लेकिन ये सही बात है की आज सोचने का ढंग बिलकुल बदल गया है और समाज उसे स्वीकृति भी दे रही है ,हम गलत चीज़ को अपना रहे है और अपनी अच्छाई को छोरे जा रहे है,हम सिर्फ अच्छी आमदनी के पीछे जा रहे है लेकिन अच्छे संस्कार के पीछे नहीं जा रहे है,यही अंतर हमें हमारी संस्कृति से दूर कर रही है .sharad

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  3. सिल्क, एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अस्सी की दशक में पैदा तो हुई लेकिन वह अपने समय से काफी आगे की सोच रखती है. व्यक्ति स्वातंत्रय की उस आदिम भावना को अपने जिस्म के लिफाफे में लपेटे वह लड़की अपने रास्ते खुद चुनती है और सोचती है कि वह अपनी मंजिल भी चुनेगी,ये उसका नितांत निजी चयन होगा. लेकिन पितृसत्तात्मक समाज के ढांचें में उसकी यह बोल्डनेस उसके खिलाफ एक ऐसा हथियार बन जाती है जिससे वह पूरी तरह निचोड़ ली जाती है, और जब तक उसे इस सच्चाई का अहसास होता है वह पूरी तरह टूट चुकी होती है. एक ऐसा समाज जहाँ औरत को देह से अधिक कुछ समझा नहीं जाता वहां ऐसी स्त्री इस त्रासद अंत के लिए अभिशप्त है...द डर्टी पिक्चर वही रियल्टी बयां करती है.

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