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मंगलवार, 2 अक्तूबर 2012

गाँधी, आत्मसंयम और स्त्री



आधुनिककाल में भारत में कामुकता के संदर्भ में जितनी भी बहसें हुई, उनमें इसे प्रच्छन्न बनाने पर अधिक जोर रहा. कामुकता के नियंत्रण के लिए आत्मसंयम और ब्रह्मचर्य को जरूरी माना गया. हिंदू, बौद्ध, इसाई धर्मों में जीवन में कुछ वर्षों के नियत समय के लिए ब्रह्मचर्य को महत्वपूर्ण माना गया. इस समय उस प्रचलित मान्यता का भी प्रबल दबाव था जिसके तहत यह माना जाता था कि पुरुष के वीर्य का निर्माण बड़ी कठिनाई से होता है. इसकी अच्छी मात्रा उसे शक्ति, स्वास्थ्य, मानसिक और आध्यात्मिक ऊर्जा देती है. अतः इसका संरक्षण कर शरीर और आत्मा को नियंत्रित किया जा सकता है. इसी के वशीभूत होकर गाँधी ने भी इच्छाओं व भावों के नियंत्रण द्वारा कामुक-व्यवहार को नियमित करने की बातें कहीं.

उन्होंने काम-व्यवहार को भोजन के साथ जोड़कर देखा. शाकाहारी भोजन को जरूरी माना. मसालों, चाय, कहवा, शराब, तंबाकू आदि से परहेज की बात कही. उनके अनुसार इससे मनुष्य की यौन-भावनाएँ उद्दीप्त होती हैं. गाँधी ने उन नारीवादियों का विरोध किया जो कामाभिव्यक्ति को आवश्यक और इसके दमन को घातक मानती थी. उन्होंने ऐसी अभिव्यक्ति को कभी स्वाभाविक नहीं माना. पैट काप्लान के अनुसार, ''गाँधी का गहरा विश्वास था कि कामुक अभिव्यक्ति अर्जित करनी या सीखनी होती है. यह सहज या प्राकृतिक नहीं होती. अतः बनिस्बत इसके कि शीघ्र विवाह द्वारा कामाभिव्यक्ति की जाए, गाँधी का मानना था कि युवाओं को शिक्षित किया जाए कि तीन या चार बच्चों से अधिक पैदा करना अनैतिक है. बच्चों के पैदा होने के बाद पति-पत्नी अलग रहें.''

यही वजह भी रही कि उन्होंने तत्कालीन अमेरीकी शिशु-जन्मदर नियंत्रण की प्रचारक मार्गरेट सेंगर के प्रचार अभियान का विरोध करते हुए गर्भनिरोध के कृत्रिम उपायों की जगह आत्मसंयम को ज्यादा उचित माना.

गाँधी काम-प्रेम की धारणा को एकसिरे से ख़ारिज करते हैं. वे भोजन और सेक्स को आनंद नहीं जरूरत के साधन-रूप में देखते हैं. वे काम-प्रेम में इच्छा, आनंद और संतुष्टि की अहम् भूमिका को दरकिनार कर देते हैं. उनका मानना था कि प्रेम, काम के साथ जुड़ते ही व्यभिचार बन जाता है. भोजन और काम को आनंद से जोड़ना पशु-वृत्ति को बढ़ावा देना है. उनकी इस धारणा का एकांगी आधार यह भी था कि स्त्रियाँ सेक्स में आनंद नहीं लेतीं. विवाह और सेक्स का लक्ष्य केवल प्रजनन है, प्रेम नहीं, आनंद नहीं. वैवाहिक जीवन, घरेलू व पारिवारिक जिम्मेदारियों, जबरिया काम-संबंधों से घिरी औरत समाज-सेवा से विमुख रह जाती है.

गाँधी की कामुक शुद्धतावाद की धारणा से प्रभावित होकर युवा स्त्री-पुरुषों ने स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लिया. बहनों को भाइयों के बराबर और माँओं को पुत्रों से श्रेष्ठ स्थान दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में अब तक पति तथा परिवार को समर्पित स्त्री देश पर न्यौछावर हो गई. उसकी निजता, इच्छा, कामुत-स्वायत्ता अब भी बेमानी थे. उसका नियत व्यक्तित्व, आकांक्षारहित मन, अकामुक शरीर राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ गया. अकारण नहीं था कि आजादी और उसके बाद हुए विभाजन की त्रासदी में औरतें पुनः घरों में लौट गई थी. अब भी खुद को केंद्र में रखकर सोचने और लड़ने का विराट संघर्ष बाकी था. हाँ, सुगबुगाहट शुरू हो गई थी. उन्होंने ब्रह्मचारी औरत, ख़ासकर हिंदू विधवा को आदर्श के रूप में पेश किया, दूसरी ओर स्त्रियों के साथ यौन-संबंधी प्रयोग कर वे ब्रह्मचर्य व्रत में सफलता हासिल करना चाहते थे. आरंभिक स्त्रीवादियों को इस दोहरे व्यवहार को समझा व इसके खिलाफ मुहीम चलाने की प्रेरणा भी ली.       
     

5 टिप्‍पणियां:

  1. गाँधी की कामुक शुद्धतावाद की धारणा एक निश्चित देश-काल- परिस्थिति में ही स्वीकार की जा सकती है - डा0 महेश आलोक - http://www.maheshalok.blogspot.in/

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  2. नारी कामुकता पर आपके विचार सराहनीय हैं। आपके लेख बहुत अच्छे हैं। क्या आपका शोध का विषय 'साहित्य में नारी कामुकता' है ? मैं एक पुरुष हूँ . ये मानता हूँ कि नारी कहीं ज्यादा सभ्य , सुसंस्कृत होती है . आकर्षक भी . पुरुष पर नारी का प्रभुत्व है . और कायम रहेगा

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  3. अश्विनीजी, मेरा विषय स्त्री कथा-साहित्य हैं..

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  4. बेहतर और संयमित प्रस्तुति।
    धन्यवाद

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